Monday, March 10, 2008

क्या विदेशी पर्यटक भारत में सुरक्षित

2 comments:

Anant Vishwakarma said...

"MERA BHARAT MAHAAN" AB YE KAHNE SE PAHLE HAMIN KAI BAAR SOCHNA PAD SAKTA HAI! KYUNKI HAAL-PHILHAAL KI GGHATNAO KO DEKH KAR HAMEIN SOCHNA PADEGA KI KYA HAMMARE DES KE LOG BHI MAHHAN HAIN...HAMARE DESH KO ATITHI KE SWAGAT KE LIYE JAANA JAATA HAI LEKIN HUM VEDESHI PARYATKO KE SAATH KYA KAR RAHE HAI.......ABHI GOA MEIN EK PARYATAK KI BALAATKAAR KE BAAD HATYA KAR DI GAYI NAA JAAANE AUR KITNE GHATNAEN HAI JINSE HUM APNE DESH AUR SASKRITI KO SARMSAAR KAR RAHE HAI.HUM HAISE KAHEIN.............MERA BHAARAT MAHAAN??????????/

Anant Vishwakarma said...

कृषि का पिछड़ापन समाज के लिये घातक

कृषि का पिछड़ापन हमारे देश की अर्थव्यवस्था को ही नहीं, सामाजिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है।यह अब चौतरफा असर दिखा रहा है। महाराष्ट्र,बुंदेलखंड,झारखंड,बिहार,उ.प्र.आदि राज्यों में खेती पर निर्भर लोगों की संख्या ज्यादा है।साथ ही किसानों द्वारा आत्महत्या करनें की संख्या भी अधिक है कोई किसान ऋण के बोझ तले आत्महत्या कर रहा है,तो कोई फसल नष्ट होने की वजह से।हमारे देश में अभी भी ऋण लेने की पुरानी परंपरा चल रही है।वे या तो ज़मींदारों से या साहूकारों से पैसे लेते हैं और उनकी ज़िदगी कर्ज के बोझ तले दम तोड़ देती है।सरकार चाहे कितनी ही कर्ज माफी की बात कर ले,लेकिन गाँव का किसान अभी भी वहीं का वहीं है।मौजूदा बजट में सरकार भले ही किसानों के 60हजार करोड़ के कर्ज की माफी की बात करे,लेकिन अगर सच्चाईयों को गौर से देखा जाए तो एक आम किसान वहीं का वहीं भूखा-नंगा खड़ाहै।
अब से पच्चीस साल पहले देश की कुल आबादी में खेती का हिस्सा एक तिहाई से ज्यादा था। अब यह कुल आबादी के पाँचवे हिस्से से भी कम है। अमेरिका,जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में यह जीडीपी के एक से दो प्रतिशत के आस-पास है। लेकिन इन देशों में खेती से कम आमदनीं चिंता की वजह नहीं है,क्योंकि वहाँ आबादी का बहुत छोटा हिस्सा ही खेती पर निर्भर है। जैसे अमेरिका में दस फीसदी से भी कम लोग खेती का काम करते हैं।लेकिन हमारे देश में इसका पिछड़ापन चिंता का विषय है,क्योंकि देश के कुल कामगारों की लगभग पचास फीसदी संख्या कृषि पर निर्भर है।इसी का नतीजा है कि हमें गावों में व्यापक गरीबी और वहाँ से शहरों की ओर जबरदस्त पलायन दिखाई देता है।जिन राज्यों में खेती का पिछड़ापन ज्यादा है,वहाँ से पलायन ज्यादा हो रहा है। इस प्रवृत्ति को देखें तो आजादी के समय लगभग पंद्रह फीसदी आबादी शहरों में रहती थी। अब यह लगभग दोगनी हो गई है और अनुमान है कि अगले बीस वर्षों में देश की आधा से ज्य़ादा आबादी शहरों में रहनें लगेगी। आनें वाले दिनों में करीब 75 करोड़ लोगों की बुनियादी जरूरतों के लिये शहरों को तैयार करना होगा।
इस पिछडेपन की ठोस हकीकत है कि आजादी के बाद के चालीस वर्षों में सिंचाई व्यवस्था का विकास तीन प्रतिशत सालाना की रफ्तार से हुआ। लेकिन 1990 के बाद तो यह रफ्तार और सुस्त पड़ गई और इस समय यह दो प्रतिशत सालाना की दर से भी नीचे रह गई है। खेती की निर्भरता बड़े पैमाने पर अब भी बारिश के पानी पर है। जिस देश की अर्थव्यवस्था सालाना नौ फीसदी की दर से बढ़ रही हो,वहाँ खेती में आए ठहराव का क्या मतलब है ?फिर जिस दौर में यह ठहराव आया है,उसी दौर में व्यापार ,होटल, वित्त-भवन निर्माण जैसे क्षेत्र दस प्रतिशत की गति से बढ़ रहे हैं। देश के सामाजिक जीवन पर भी इसका असर पड़ रहा है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में गावों से शहर आए लोगों में और उत्तर भारतियों में इसका टकराव अभी देखनें को मिला है। सीमित साधनों में ढेर सारे लोगों में होड़ मची है। इस समस्या से गंभीरता से निपटना होगा।इसके लिये जिन राज्यों में पलायन अधिक हो रहा है वहाँ औधोगिकरण की गति को तेज करना होगा। क्योंकि इन लोगों की बदलती आर्थिक स्तिथि ही इस समाज को बदलेगी। यह देखना रोचक होगा...।


---------------अनंत विश्वकर्मा-------------